"तुम भी इक दरिया हो"
ज़िन्दगी यूँ भी ख़ूब-सूरत है.
किनारे पर बैठे-बैठे
दरिया में जाते हुए
लोगों को देखते रहना
मगर दरिया में न जाना,
मौजो को दूर से देखना
मगर छूने की कोशिश न करना
दिल लाख कहे,
"चल हम भी एक बार छूते हैं ना !"
मगर मैं जानता हूँ
मौज आख़िर को मौज है
और दरिया दरिया!
तुम भी इक दरिया के जैसी हो
मैं किनारे पर ही ठीक हूँ
— Navneet Vatsal Sahil















