"छुटे हुए पुरुष"

प्रेम में छुटे हुए कुछ पुरुष
पुरुष नहीं रहते
वो हो जाते हैं स्त्री
वो ख़ुद को भर लेते हैं
भावुकता और आँसू से
प्रेम में छुटे पुरुष
प्राप्त कर कर लेते स्त्रीत्व के उस गुण को
जिस
में होता है मीरा सा पागलपन
राधा सा निःस्वार्थ प्रेम
वो चुनते हैं मीरा या राधा हो जाना
या हो जाना दोनों ही
दोनों हो जाना अत्यधिक दुःखद है
उसे सहन करनी होती हैं तब दोनों ही पीड़ा
राधा जिस के बगैर कृष्ण नाम अधूरा है
परन्तु फिर भी राधा के हिस्से आता है वियोगी जीवन
और वो चुन लेती है
कृष्ण की यादों के साथ जीवन निर्वाह
मीरा जिस के बगैर कृष्ण कोई भगवान नहीं
और मीरा को मिलता है तिरस्कृत जीवन
और अंतिम स्वांस तक वो चुनती है कृष्ण भक्ति
दोनों ही अनंत प्रेम की पर्याय हैं
जो बताता है अथाह या निःस्वार्थ प्रेम
सदैव एक तरफ़ा रहा है
वो नहीं प्राप्त कर पाता रुक्मणि होना
राधा की भाँति
मीरा ने नहीं स्वीकार किया प्रेमिका बने रहना
और उस ने कृष्ण को पति कहा
राधा हो जाना दुःखद तो है
मीरा हो जाना अत्यंत दुःखद
मैं भी तुम्हारे प्रेम में छूटा एक पुरुष हूँ

— Navneet Vatsal Sahil

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