"इक जादुई लफ़्ज़"

ना आप था ना तुम था ना तू था
कभी नाम नहीं लिए
हम ने एक दूसरे के
फिर भी कितनी बातें होतीं थीं
इक लफ़्ज़ था
लफ़्ज़ क्या था
जान जान और जान था
ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था
इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था
इस
में वो सब कुछ था
जो हमें एक दूसरे से चाहिए था
इस
में वो सारे वाइदे थे जो
लोग मिलते वक़्त करते हैं
वो सारी क़स
में थीं
जो बिछड़ते वक़्त के लिए थीं
ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था
इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था

जानते हो दोस्त ये लफ़्ज़
महज़ क़स
में-ओ-वायदे ही ना था
एक वाकया था पूरा
हमारी मोहब्बत का

ये इक ऐसा लफ़्ज़ था
जिस
में सांसें थीं
जो अकेला सारे ठंडे लफ़्ज़ों के बीच
गर्म था ज़िन्दा लफ़्ज़ था
इक वही तो गवाह था
हम मोहब्बत में कितने सच्चे थे

एक ऐसा लफ़्ज़ जिसे बोलते हुए
अपना बदन ख़ुश्बूओं की क़बा लगती
पेड़ नाचते लगते
और हवा बहकती लगती
ये लफ़्ज़ महज़ इक लफ़्ज़ नहीं था
इस इक लफ़्ज़ में कितना कुछ था

एक ऐसा लफ़्ज़
जिस का सुकून बोलने से ज़्यादा
सुनने में आता
कानों में मिश्री घोलती उस की आवाज़
के साथ जब ये लफ़्ज़ मिलता
बदन सर-सरा उठता
कलियाँ ख़ुद ही भँवरो से
बोसे लेने को मचल उठतीं
लगता मानो ज़िन्दगी
दूर तलक सिर्फ़ छाँव है
मानो सारी काइ‌नात सिर्फ़
मुझ पर मेहरबान थी
अब ऐसे आलम में कभी जान ना पाया
ये छाँव सिर्फ़ मुझ पर मेहमान थी

पर ये लफ़्ज़
हैराँ हूँ
अभी तलक सुनाई देता है

— Navneet Vatsal Sahil

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