"हिज्र मनाने क्यूँँ नहीं देते"

जानाँ
ये मेरे आस-पास जमा
ख़ुशनुमाँ लोग
तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँ नहीं देते
ये मुझे रोने क्यूँ नहीं देते?

गर सीने में दर्द हो
तो रोना ज़ब्त क्यूँ हो?
इन्हें तो मालूम ही नहीं
रोते क्यूँ है
दर्द कैसा होता है
जीते-जी मौत क्या होती है
तुम तो जानती हो जानाँ
आओ और इन्हें बतलाओ
ये मेरे आस-पास जमा
ख़ुशनुमां लोग
तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँ नहीं देते
ये मुझे रोने क्यूँ नहीं देते?

गर रोना ज़ब्त है
चश्मा नम क्यूँ बनाया गया?
इन लोगों को भी तो
कभी आता होगा रोना
फिर मुझे क्यूँ रोकते हैं?

तुम्हीं बतलाओ जानाँ
जिस का दिल मर चुका हो
दुनियां नज़रो के सामने
राख़ हो जाए
वो जो अपनी हालत पर
ग़ौर करने से डरता हो
लोगों के कह-कहों से
सहम जाता हो
जिस के सीने में दर्द ठहरा हो
जो पलकें झपकने से भी डरता हो
जिस की आँखों में अब
मौत ख़्वाब बनकर रहती हो
शीशों से भी खौफ़ खाने लगे
क्या करे...गर आँसू आने लगें?
तुम तो जानती हो जानाँ
आओ और इन्हें बतलाओ

इन्हें बतलाओ कि
क्यूँ नाला-ए-दर्द गले में
ख़राशें न डाले?
चीख-चीख कर कोई क्यूँ
सीने में दरारें ना डाले?
आँसुओं के ज़ोर से
चश्में चटखा ना डाले?
मैं रोता हूँ... हाँ
क्यूँकि मेरे आब दीदा हैं
इन
में इतना पानी है
कि सब कुछ बहा सकता हूँ
फिर क्यूँ
ये दर्द नहीं बहा सकता?
तुम्हारा हिज़्र नहीं मना सकता?
तुम तो जानती हो जानाँ
आओ और इन्हें बतलाओ

ये मेरे आस-पास जमा
ख़ुशनुमां लोग
तुम्हारा हिज़्र मनाने क्यूँ नहीं देते
ये मुझे रोने क्यूँ नहीं देते?

— Navneet Vatsal Sahil

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