हिज्र की रातें
हिज्र की रातें
रातें नहीं होतीं
हिज्र की रातें साँप होती हैं
सियाह काले साँप
जो शाम ढले बाहर निकलते हैं
यादों के बिल से
और शुरू कर देते हैं डसना
ज़हर जब चढ़ने लगता है
जिस्म ठंडा पड़ने लगता है
धड़कन कभी इतनी तेज़
कि कमरा गूँजने लग जाए
कभी इतनी धीमी
कि नब्ज़ टटोलनी पड़ जाए
साँसें इतनी बेचैन
मानो दिया बुझने को हो
और आख़िरी क़तरा बाक़ी हो तेल का
दर्द ऐसा दिल में
ख़ून के क़तरे
आँखों से निकलने लगते हैं
पर मौत नहीं आती यका यक
आहिस्ता आहिस्ता लाती हैं
हर एक ख़्वाहिश और
एहसास को मारते हुए
अंदरू लाश बनाते हुए
हिज्र की रातें साँप होती हैं
हिज्र की रातें
रातें नहीं होतीं
— Navneet Vatsal Sahil














