वो मुझ को देख कर कुछ ऐसे चंचल हो उठी थीकोई सूखी नदी ज्यूँ जल से अविरल हो उठी थीचमकते चंद्रमा की चाँदनी में ज्यूँ चकोरीनहा धो कर के महकी और निर्मल हो उठी थी— Nityanand Vajpayee