बराए-ज़र मोहब्बत का ख़ज़ाना छोड़ देती हैं
हसीनाएँ हैं इश्क़-ए-सूफ़ियाना छोड़ देती हैं
बड़ी गुस्ताख़ होती हैं ये कम-सिन लड़कियाँ ऐ दोस्त
दिवाना कर दिवाने को दिवाना छोड़ देती हैं
हरारत है कि चारों मौसमों में कम नहीं होती
बहारें हैं कि हर मौसम सुहाना छोड़ देती हैं
बलाएँ हैं हिचकती हैं अजल तक साथ देने में
ये आधी-जान ले कर मेरा शाना छोड़ देती हैं
जब उस के नरख़रे से जन्म लेता है कोई आहंग
बहुत सी कोयलें नग़मात गाना छोड़ देती हैं
तुम्हारे बिन तुम्हारी यादों के बिन उँगलियाँ मेरी
फ़क़त दो-चार पन्नों पर फ़साना छोड़ देती हैं
'मिलन' कुछ लड़कियों में शौक़िया होती है तर्रारी
नए आशिक़ के मिलते ही पुराना छोड़ देती हैं















