तुम्हारे बा'द हम क्या-क्या नहीं ख़ुद में बनाते हैं
कभी मरघट बनाते हैं कभी लाशें बनाते हैं
किसी का इश्क़ तारी हो चुका है जान जाने तक
मोहब्बत में हम ऐसे लोग ज़ंजीरें बनाते हैं
हमें मौक़ा मिलेगा जब दिखा देंगे फ़ना होकर
तुम्हें क्या लगता है क्या सिर्फ़ हम बातें बनाते हैं
चलो ना साथ मिल कर घूमते हैं सारी दुनिया हम
चलो ना साथ मिल कर दाइमी यादें बनाते हैं
कोई है साहिब-ए-माल और कोई तो रिज़्क़ का मारा
ख़ुदाया आप जाने कैसी तक़दीरें बनाते हैं
नहीं बर्दाश्त होता उन से ख़ुद की बेटियों का इश्क़
जो सोशल मीडिया पर 'इश्क़िया रीलें बनाते हैं
कहाँ तक ख़ौफ़ खाएँ ख़ानदानी बेड़ियों से हम
पुराने क़ाएदे छोड़ो नई रस्में बनाते हैं
बस उस की इक झलक ही देख कर पगला गईं आँखें
'मिलन' उन से मिलाओ जो नई आँखें बनाते हैं















