मेरे अरमाँ नहीं टूटे मेरी उल्फ़त नहीं टूटी
फ़क़त अफ़सुर्दगी इतनी तेरी आदत नहीं टूटी
हज़ारों मुश्किलें आईं क़दम जब डगमगाए तब
मुझे मंज़िल नज़र आई मेरी हिम्मत नहीं टूटी
बड़ी जिद्द-ओ-जहद की साज़िशें की इस ज़माने ने
यक़ीं बुनियाद था उस की सो वो सोहबत नहीं टूटी
प्रसव का दर्द झेला माहवारी से बदन टूटा
वो यूँ तो ख़ूब नाज़ुक थी मगर औरत नहीं टूटी
— Prashant Prakhar















