दुख की नज़रें जमी हमारे हक़ में है
बस इक तेरी कमी हमारे हक़ में है
अब तो तन्हाई डसती है हमकों ये
जैसे लगता हमी हमारे हक़ में है
लोगों के तो पास क़तारें लंबी है
सड़के रति की थमी हमारे हक़ में है
जिस से, जब भी ढूँढ़ो ख़ुशियाँ दो पल की
दिखता बस आदमी हमारे हक़ में है
दिल दे कर दिल बदला है जब से मैं ने
मौसम बस मातमी हमारे हक़ में है
— Pankaj murenvi















