ग़मज़दा इस ज़िन्दगी को देखते हैं
और फिर अपनी घड़ी को देखते हैं
ये सुकूँ मानो कि मर के चैन से हम
जी रहे हर आदमी को देखते हैं
आप क्या क्या देखते हैं आप जानें
हम मगर सादा-दिली को देखते हैं
कुछ कहूँ हाँ यार अच्छा ये बताना
कब से मुझ
में रफ़्तगी को देखते हैं?
आप भी सबकी तरह हैं 'ऐब-बीनी
आप भी मेरी कमी को देखते हैं
प्यार क्या है?, आप बस इतना समझिये
राम अपनी जानकी को देखते हैं
— Prashant Sitapuri















