मतलब नहीं कि दरमियाँ अच्छा बना रहे

मैं चाहता हूँ आपसे रिश्ता बना रहे

ता'उम्र जिस के वास्ते उलफ़त बनायी है
वो शख़्स मेरे हिस्से में धोखा बना रहे

अच्छी तरह से है मुझे दुनिया का इल्म, सो
क्या काम है जो आप सब अपना बना रहे

मुझ को बनाना हू-ब-हू मुमकिन नहीं है अब
तुम जो बना रहे मेरा चरबा बना रहे

टूटे अगर तो इत्र सी ख़ुश्बू बिखेर दे
कुछ दस्तकार फूल से शीशा बना रहे

मर्ज़ी से हो रही है अगर जान आप की
बेकार में फिर आप ये पिंजरा बना रहे

जब तक था मुझ
में मैं तो नहीं की थी तुम ने क़द्र
अब चाहती हो मुझ
में वो लड़का बना रहे

— Prashant Sitapuri

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