
इस समय ख़ुद का पसंदीदा हो जाता हूँ मैं
शाम होते ही तो संजीदा हो जाता हूँ मैं
बीते ख़्वाबों में तो कुछ देर तलक रहता हूँ
उस से भी ज़्यादा तो नम-दीदा हो जाता हूँ मैं
— Naresh sogarwal 'premi'
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