"मैं मोहब्बत हूँ"
मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा
कि मैं तो मोहब्बत हूँ
मैं शबरी के जूठे लबों से
राम के पेट तक जाता बैर हूँ
जिस के लिए कृष्ण ने शाही भोजन ठुकराया
मैं विदुर का कुबेर हूँ
मैं हर बार आता हूँ पर
जहाँ मुझे पहचान नहीं पाता
अगर पहचान भी ले प्रीत
तो ठीक से जान नहीं पाता
कहीं रोमियो-जूलियट के
मरकज़ की दीवार हूँ
जिसे खोदता हुआ फ़रहाद मर गया
नहर का वो पार हूँ
जिस के किनारों पर सागर-ए-सहरा है
जिस
में कोई क़ैस मजनू हो कर
गाम-ब-गाम भटक रहा है
लैला की कलाई हूँ
मैं ख़य्याम की रूबाई हूँ
मैं नज़्म-ए-फ़ैज़ हूँ
मैं सब से तेज़ हूँ
मैं सय्याद हूँ
चाक-ए-क़फ़स हूँ
जिस्म-ओ-दिल के दरमियाँ हूँ
इश्क़ हूँ हवस हूँ
बे-वफ़ाई का ख़ुदा हूँ
वफ़ादारों का पीर हूँ
सब मुझ से रहाइश-पज़ीर हैं
और मैं सबका असीर हूँ
मुझ से सब की ये हालत है
मैं हालात से पशेमाँ हूँ
मैं दस्त-ए-ज़ुलेखा भी हूँ
मैं ही चाक-गरेबाँ हूँ
मैं मीर-ओ-ग़ालिब की ग़ज़ल हूँ
कीचड़ हूँ कमल हूँ
जो मेरे अंदर उतरे
कभी बाहर न आने पाए
कि मैं तो दलदल हूँ
मैं हीर-राँझा के मरकज़ हिज्र हूँ
महबूब की गाली हूँ
माँ की फ़िक्र हूँ
मैं वो लफ़्ज़ जिसे सुन कर शाह
भरी महफ़िल औरत का पैरहन उतरता है
मैं वो दुआ जिसे पढ़ने पर
कोई कृष्ण आ के उसे बचाता है
मैं वो अल्फ़ाज़ जिसे गा कर जवान
सरहद पार से प्रेमिका को पुकारता है
मैं वो कंगन जो विधवा के लिए
विरह के गीत गाता है
मैं श्रृंगार मैं ही विरह गीत हूँ
दुनिया शाइ'र जाने मुझ को
लेकिन मैं तो प्रीत हूँ
मेरी दुनिया को चाहत है
कि मैं रस्म-ए-अदावत हूँ
आज़ाद की गोली हूँ
भगत सिंह की बग़ावत हूँ
मेरे बा'द दुनिया का क्या होगा
कि मैं तो मोहब्बत हूँ















