बैठने को जिसमें मेरा करता है ये मन बहुततुम वो मध्यम धूप के साए सी लगती हो मुझेक्यूँ करोगी तुम सजावट तन पे या मन पे कोईसच कहूँ तो तुम हमेशा सादा जचती हो मुझे— Raunak Karn