यहाँ तो वक़्त पे रिश्ता निभाता तो नहीं है अब
ज़िया की बात हो फिर भी बताता तो नहीं है अब
कहानी वो सुनाता भूल कर सारे नज़ारा को
दिलों की बात भी मुझको सुनाता तो नहीं है अब
नहीं थी बूझ तो सारी कि सारी चाह कह देते
हुई जब बूझ तब से दिल जताता तो नहीं है अब
अरे सबको पड़ी है बस यहाँ तो जान की आख़िर
यहाँ पे फूल पेड़ों को लगाता तो नहीं है अब
नहीं है दौड़ ' रौनक ' जब सभी बातें बताता था
दिखाई जो परे वो भी दिखाता तो नहीं है अब
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