हो मुबारक आप को ये सल्तनत
है जहाँ मेरी नहीं कुछ अहमियत
काट लेंगे यार हम तन्हाइयाँ
हो मुबारक़ आप को मसरूफ़ियत
मैं जला बैठा जो दिल तो क्या हुआ
आपने भी तो जला डाले हैं ख़त
दरमियाँ बढ़ती गई जब दूरियाँ
नफ़रतों ने छीन ली मासूमियत
काट लेंगे यार हम तन्हाइयाँ
हो मुबारक़ आप को मसरूफ़ियत
मैं सभी से पूछ लेता हूँ मगर
हैं नहीं पूछे मेरी जो ख़ैरियत
मैं अकेला तो नहीं था इश्क़ में
आपने भी तो किए थे दस्तख़त
'वीर' थोड़ा मन दुखा पर छोड़िए
कह दिया कुछ भी ग़लत तो माज़रत
— Ravi 'VEER'















