पहले दिल को आह मिली
फिर ग़ज़लों को वाह मिली
जिस की ख़ातिर मैं तरसा
गैरों को वो बाह मिली
मैं ने था चाहा जिस को
उस को सबकी चाह मिली
हाल मेरा जिस ने पूछा
उन को इक अफ़वाह मिली
अरसों तक ख़ुद को बेचा
तब जा कर तनख़्वाह मिली
बरसों तक भटका पहले
फिर जा कर इक राह मिली
'वीर' तुझे है हैरत क्यूँ ?
किस को आख़िर चाह मिली ?
— Ravi 'VEER'















