tumheen nahin ho ki jiske hisse apar dukh hain | तुम्हीं नहीं हो कि जिसके हिस्से अपार दुख हैं

  - Siddharth Saaz

तुम्हीं नहीं हो कि जिसके हिस्से अपार दुख हैं
हमारी आँखें भी बोलती हैं कि यार दुख हैं

समझ रहा है तू जिसको अपनी ख़ुशी की गठरी
नहीं हैं इस
में ख़ुशी इसे तू उतार, दुख हैं

अगर तुम्हें लग रहा है ये दुख बस ऊपरी हैं
ये हाथ देखो क़तार-अंदर-क़तार दुख हैं

कुछ एक ही बस बचे हैं जिनको है तुझ सेे उम्मीद
हमें तू आकर सँभाल परवरदिगार, दुख हैं

इन्हें छुपाएँ कि इनपे लिक्खें कि इन को रोएँ
दो-चार होते तो भी सही था, हज़ार दुख हैं

ये जिस तरह से हवा में शामिल है ऑक्सीजन
उसी तरह से हर इक ख़ुशी में शुमार दुख हैं

मैं अपने जैसों को ढूँडने में लगा हुआ हूँ
तुझे भी दुख हैं तो साथ आकर पुकार, दुख हैं

  - Siddharth Saaz

Khushboo Shayari

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