सभी ग़ज़लों के साए में हमेशा ग़म बताती हूँ

कि जिन बातों से जीती थी वो हो बेदम बताती हूँ

जिसे अब याद कर शब भर तड़पती हूँ सिसकती हूँ
उसी की याद को मैं सुब्ह फिर मरहम बताती हूँ

वो जिस का ज़िक्र हो जाने से मुझ को हो रही उलझन
मगर उस की ही बातें हर घड़ी हरदम बताती हूँ

कि ये जो सामने है शख़्स पर अंजान लगता है
इसी सूरत से मिलते शख़्स को हमदम बताती हूँ

— Sakshi Saraswat

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