गीतों में जो मुखड़ा बनता है

वो ग़ज़लों में मतला बनता है

खेल दिखा कर बोला जादूगर
देखो अब देखो क्या बनता है

मुझ पे जब भी किरनें पड़ती हैं
दीवारों पर साया बनता है

और कहीं बनते होंगे आदम
चाक पे केवल ख़ाका बनता है

सारे हक़ जब तुझ को दे डाले
तेरा मुझ से लड़ना बनता है

बनता है जब पीठ पे एक भँवर
तब जा कर कुछ पैसा बनता है

वहशत से जो देखता है औरत
आगे चल कर अंधा बनता है

किस साॅंचे ने उसे बनाया फिर
जिस से ख़ुद ही साॅंचा बनता है

— Sandhya maurya

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