न होगी बात हम में कोई वो फिर क्यूँ बुलाएगा

जो होगी बात मतलब की तो सीने से लगाएगा

मिले हैं क़र्ज़ में ये दर्द ये तकलीफ़ ये काँटे
चुकाना ही पड़ेगा क़र्ज़ कब तक मुस्कुराएगा

अगर कुछ बात करनी हो तो सोचो लफ़्ज़ पहले तुम
जो निकली बात दिल की तो बहुत दिल को रुलाएगा

उतर कर वो ख़ुदा भी तो नहीं आता है मेरी ओर
अगर फ़ुर्सत हो उस को तो मिरा घर भी बसाएगा

कुरेदो चाहे कितना भी किसी इंसान का दिल तुम
अगर होगा न दिल उस का तुम्हें क्या ही बताएगा

बहुत उल्फ़त से मिलते हैं बहुत से लोग वैसे तो
मगर उल्फ़त है जिस इंसाँ से कब उस से मिलाएगा

जो गेहूँ खेत में बोया उगा तो बाँट ही डाला
बचा ही क्या है अब घर में जो बच्चों को खिलाएगा

ये दुनिया उखड़ी उखड़ी है हवा भी उजड़ी बहती है
है ख़ालिक़ तू तो दुनिया का इसे कब तू सजाएगा

— Sanjay Bhat

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