इस लिए भी छलक मैं जाता हूँ
अपने अंदर नहीं समाता हूँ
यूँ तो लाइक़ नहीं ग़ज़ल इस के
आप कहते हैं तो सुनाता हूँ
छोड़ पाता नहीं हूँ फिर उस को
अपनी आदत में जिस को लाता हूँ
मुझ को शाइ'र न तुम बता देना
मैं तो बस क़ाफ़िये मिलाता हूँ
देखता हूँ तमाम दुनिया को
इस का हासिल अमल में लाता हूँ
मौत लेने 'सुमित' मुझे आई
आज जीने से बाज़ आता हूँ
— Sumit Panchal















