करवट पे करवट ये सुरूर-ए-नफ़स हो शायद
बिस्तर में अब के आख़िरी बरस हो शायद
जुर्म-ए-मोहब्बत में तो बस जाँ जानी है दोस्त
तुम बच निकले हो तो अहल-ए-हवस हो शायद
मेरे गले में गर तेरी साँसें हैं दिलबर
तेरी कलाई में भी मेरी नस हो शायद
मौला तेरी नगरी में है बड़ा ख़ौफ़-ए-मौत
रिंदों की बस्ती में ख़ाक चरस हो शायद
कहते रहते हो दिन भर पत्थर को पत्थर
कोमल कहके देखो टस से मस हो शायद
— khamakhaah















