khamakhaah

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@Surajselacoti

khamakhaah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in khamakhaah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

जबीन-ए-बोसा पे ज़ंग लाने वाला मैं लम्हा लम्हा उम्र गॅंवाने वाला मैं दिल भी है ज़ंग-आलूदा बेंच सा जिधर तेरी याद की धूल उड़ाने वाला मैं सुब्ह मिरी ता'बीर की नब्ज़ टटोले तू बाम-ए-शब से ख़्वाब गिराने वाला मैं सिरे सिरे पे जिस्म उतारे जाता तू मिटा मिटा के नैन बनाने वाला मैं पर्वत पंछी झरने ये देवदार के पेड़ सब को अपनी याद दिलाने वाला मैं लफ़्ज़-ए-मौत पे होंठ दबाने वाला तू लफ़्ज़-ए-मौत पे काश लगाने वाला मैं गगरी था में दूर से आने वाला तू फ़ुग़ाँ-ए-तिश्ना-लब को दबाने वाला मैं आँख मिचौली करती है जाले में धूप परतव के छींटे में नहाने वाला मैं — khamakhaah
परवाज़-ए-हस्ती का मंज़र-ए-आख़िर होते होते हम तो पैरों से ज़ंजीर बने फिर होते होते यूँँ ही मक़्तल-ए-दुनिया में हम जान बचा फिरते हैं मर ही जाना हैं जब हम को शातिर होते होते सूरत-ए-हाल तमाशाई ने ख़ूब ज़बाँ से चाटी चश्म-ए-पुर-नम पे ख़ून-ए-दिल ज़ाहिर होते होते है बर्क़-ए-हुस्न-ओ-क़ामत और ऐसे नाज़ुक अक़्दाम माशा-अल्लाह कह दिया है काफ़िर होते होते घर से बाँधे निकले थे तज्रिबा-ए-उलफ़त क्यूँँकर काम मिला था कार-ए-जफ़ा में माहिर होते होते साबित करनी थी अपनी बेदारी और बेचैनी सो जबरन फिसले तिरे दर पे हाज़िर होते होते — khamakhaah
आतिश-ए-दोज़ख़ से उस कूज़ागर में आग लगे रहबर की मशअल से अब रहबर में आग लगे बड़ी ज़हीन थी वो बेवा जो कहती रहती थी आग लगे तो सब सेे पहले सर में आग लगे हो के सवार ग़ुलाम पर माँगे है तू रफ़्तार ओ शहज़ादी तेरी दौलत-ओ-ज़र में आग लगे मौसम को गालियाँ न दे अब ऐ बाद-ए-कोह तू लंगड़ो की बद-दुआ से तेरे पर में आग लगे बेहिस चीज़ो के सिवा क्या है ख़ाना-ए-ख़ाम में पर तस्वीर बचा लेंगे जो घर में आग लगे तू भी ज़ालिम ज़ालिम मैं भी टूटा टूटा सा नयन नयन मिल के पत्थर पत्थर में आग लगे हम शर्मीले लोग शजर बन लेंगे क़ब्र में और अलाव बन जाएँगे जो पैकर में आग लगे — khamakhaah
मुश्किल रस्तों में से धूल उड़ेगी कितने छालों में से धूल उड़ेगी सोया है जो ख़ुदा हज़ारों सालों उठा तो पलकों में से धूल उड़ेगी जब गुज़रेगा दीवाने का जनाज़ा आप की राहों में से धूल उड़ेगी थकन मुसाफ़िर की इक रात कभी ओढ़ तेरे ख़्वाबों में से धूल उड़ेगी कीलो के घर में क्यूँँ हवा बुला दी अब दीवारों में से धूल उड़ेगी क़ैदी उधर छुपे हैं ऐ तीर-अंदाज़ जिधर के पेड़ों में से धूल उड़ेगी आज का दिन गर अँगड़ाई का दिन है तो ज़ंजीरों में से धूल उड़ेगी आज समुंदर प्यास बुझाएगा तो कितनी लहरों में से धूल उड़ेगी तेरी आँखों में जो मैं धूल झोंकूँ मेरी आँखों में से धूल उड़ेगी — khamakhaah
ये दिल-लगी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें ये काम भी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें हम ने बड़ी मुश्किल से सीखा नाम जिस का ज़िंदगी वो ज़िंदगी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें किस ने हँसाया था कभी किस ने रुलाया है अभी ये ध्यान भी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें हम हार के भी चल दिए हैं राह पे ये ही बहुत रस्ता सही अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें हम भी हँसे थे जानकर तुम भी हँसो ये जानकर हम को ख़ुशी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें इक उम्र तक घर में रहे इक उम्र में बाहर गए घर में घड़ी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें अपने सिरहाने इक ज़माने से पड़ा है टूटा दिल सच-मुच परी अब हो न हो क्या फ़र्क पड़ना है हमें — khamakhaah

Nazm

"याद का चेहरा" इक रोज़ की इक शाम को इक पार्क में मेरी तरफ़ रख रख के माथे को ज़मीं पे धूप वो आती रही और साथ में उस के कोई तो याद का चेहरा भी था जो धूप सीने पे लगा के अपने वो चेहरे की याद या याद का चेहरे को मेरी सम्त को लाती रही वो याद का चेहरा ढका था रौशनी से सर-ब-सर सो इस लिए मेरी नज़र में दूर से ओझल रहा पर जब मेरे नज़दीक वो आता रहा तो ये हुआ मेरी नज़र में और भी ओझल हुआ फिर और हुआ जैसे कि मिट्टी ख़ाक में ख़ुश्बू हवा में या सफ़ेद अक्षर किसी काग़ज़ पे और फिर देखते ही देखते जब मुझ सेे वो गुज़रा तो फिर मालूम मुझ को ये हुआ वो धूप था जो जाके कल की सुब्ह में खो जाएगा और मैं वो साया हूँ जो जा के रात में खो जाएगा — khamakhaah
" चमड़े की बेल्ट " जी सर आप को क्या चाहिए बताओ मुझ को ऐसी भैंस की चमड़े की बेल्ट चाहिए जिस की पीठ में धूप फिसल के मानो ऐसा रंग खिलाती थी जैसे कि चाँदनी रंग-ए-शब चूम रही हो जिस की पूँछ हमेशा मटकती चटकती थी गाती थी नाचती थी पैहम मौज-ए-हवा की सोहबत में जिस की इक दुश्मन थी कम्बख़्त एक चिड़िया जो हरदम करवट मार के पीठ में बैठी रहती थी जो भैंस अपनी सींगो में से रगड़-रगड़ के धूल उड़ाती थी जो इतनी बेग़ैरत थी नाज़ुक-ओ-कमसिन से सुर्ख़ हाथ के मानिंद हर किसी को अपना थन छूने देती थी जिस के ऊपर बच्चे चढ़के यम हूँ मैं यम हूँ मैं कहते रहते थे जो दिन-भर मुँह से ग़ुब्बारे बनाती थी जो पानी के चार घड़े पी जाती थी जो पूरी रात रोज़ दूध बनाती थी बता किसी ऐसी भैंस का तिरे पास चमड़े की बेल्ट है क्या दुकान पर ऐसी बेल्ट तो कब की हाथों हाथ बिक चुकी है सॉरी सर सारी ख़त्म हो चुकी हैं — khamakhaah