परवाज़-ए-हस्ती का मंज़र-ए-आख़िर होते होते

हम तो पैरों से ज़ंजीर बने फिर होते होते

यूँ ही मक़्तल-ए-दुनिया में हम जान बचा फिरते हैं
मर ही जाना हैं जब हम को शातिर होते होते

सूरत-ए-हाल तमाशाई ने ख़ूब ज़बाँ से चाटी
चश्म-ए-पुर-नम पे ख़ून-ए-दिल ज़ाहिर होते होते

है बर्क़-ए-हुस्न-ओ-क़ामत और ऐसे नाज़ुक अक़्दाम
माशा-अल्लाह कह दिया है काफ़िर होते होते

घर से बाँधे निकले थे तज्रिबा-ए-उलफ़त क्यूँकर
काम मिला था कार-ए-जफ़ा में माहिर होते होते

साबित करनी थी अपनी बेदारी और बेचैनी
सो जबरन फिसले तिरे दर पे हाज़िर होते होते

— khamakhaah

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