जबीन-ए-बोसा पे ज़ंग लाने वाला मैं
लम्हा लम्हा उम्र गॅंवाने वाला मैं
दिल भी है ज़ंग-आलूदा बेंच सा जिधर
तेरी याद की धूल उड़ाने वाला मैं
सुब्ह मिरी ता'बीर की नब्ज़ टटोले तू
बाम-ए-शब से ख़्वाब गिराने वाला मैं
सिरे सिरे पे जिस्म उतारे जाता तू
मिटा मिटा के नैन बनाने वाला मैं
पर्वत पंछी झरने ये देवदार के पेड़
सब को अपनी याद दिलाने वाला मैं
लफ़्ज़-ए-मौत पे होंठ दबाने वाला तू
लफ़्ज़-ए-मौत पे काश लगाने वाला मैं
गगरी था
में दूर से आने वाला तू
फ़ुग़ाँ-ए-तिश्ना-लब को दबाने वाला मैं
आँख मिचौली करती है जाले में धूप
परतव के छींटे में नहाने वाला मैं
— khamakhaah















