आतिश-ए-दोज़ख़ से उस कूज़ागर में आग लगे
रहबर की मशअल से अब रहबर में आग लगे
बड़ी ज़हीन थी वो बेवा जो कहती रहती थी
आग लगे तो सब से पहले सर में आग लगे
हो के सवार ग़ुलाम पर माँगे है तू रफ़्तार
ओ शहज़ादी तेरी दौलत-ओ-ज़र में आग लगे
मौसम को गालियाँ न दे अब ऐ बाद-ए-कोह तू
लंगड़ो की बद-दुआ से तेरे पर में आग लगे
बेहिस चीज़ो के सिवा क्या है ख़ाना-ए-ख़ाम में
पर तस्वीर बचा लेंगे जो घर में आग लगे
तू भी ज़ालिम ज़ालिम मैं भी टूटा टूटा सा
नयन नयन मिल के पत्थर पत्थर में आग लगे
हम शर्मीले लोग शजर बन लेंगे क़ब्र में और
अलाव बन जाएँगे जो पैकर में आग लगे
— khamakhaah















