ऐसी शब-ए-फ़िराक़ मुनव्वर कैसे करलें हम
पत्थर का दिल है तो गौहर कैसे करलें हम
हम को तो इक साथ उठानी चाहिए थी दीवार
अब अपनी दीवार बराबर कैसे करलें हम
थोड़ा सा तो रखना पड़ेगा सब्र-ओ-क़रार यार
कार-ए-मोहब्बत को यूँ फ़र-फ़र कैसे करलें हम
सर से कैसे धड़कें हम दिल से कैसे सोचें
अपने सर को दिल दिल को सर कैसे करलें हम
हम कर भी लेते हैं जो बंदगी-ए-दिलबर तो
ख़्वाहिश-ए-हमबिस्तरी-ए-दिलबर कैसे करलें हम
माना सारे ज़ख़्मों को है तिरे हाथों की तलब
पर इनको दस्त-ए-चारागर कैसे करलें हम
— khamakhaah















