टूट कर तारा गिरा जाने कहाँ है
मर गया जो बस ख़ुदा जाने कहाँ है
लड़ रहा था दर बदर जिस के लिए मैं
जीत कर भी वो मिला जाने कहाँ है
इन शजर इन वादियों में रंगभर दूँ
रंग बस इक ही हरा जाने कहाँ है
आँखें जो देखी न लब जो छू न पाए
वो भली सूरत भला जाने कहाँ है
चल रहा है जो क़दम मुझ से मिलाकर
दिख रहा है पर छुपा जाने कहाँ है
कर रहा हूँ यूँ तग़ाफ़ुल इस जहाॅं को
नींद से उठकर लगा जाने कहाँ है
— khamakhaah















