पस-ए-पर्दा कहानी बाँध दी हम ने
खुली जो आँख पट्टी बाँध दी हम ने
अगर इंसाफ़ इस को कहते है दुनिया
तो रहने दे तू रस्सी बाँध दी हम ने
नहीं आया हमें घर छोड़ के जाना
ज़रूरत जितनी रोटी बाँध दी हम ने
नदी में कुछ नहीं तो ख़ैर कम से कम
जिधर डूबे रवानी बाँध दी हम ने
शब-ए-तूफ़ान-ए-वहशत हम बिखर जाते
भला हो जो कि बेड़ी बाँध दी हम ने
किनारे शाम उम्मीद-ए-सहर ले के
शिकस्ता-हाल कश्ती बाँध दी हम ने
— khamakhaah















