प्यार का जब सवाल रक्खा है
तो कशिश कह के टाल रक्खा है
आज शीशे में देख कर ख़ुद को
इक परिंदा उछाल रक्खा है
मैं तो वो टूटी बैंच हूँ जिस
में
इक गुलाबी रुमाल रक्खा है
उस के इक इक ख़याल का मैं ने
कितना अच्छा ख़याल रक्खा है
एक बेशर्म अब्र ने देखो
मुँह में सीना निकाल रक्खा है
— khamakhaah















