khamakhaah

Top 10 of khamakhaah

    सबने कितनी लज़्ज़त से देखा मुझ को
    रोज़-ए-मर्ग तबीअत से देखा मुझ को

    आने वालों को सानेहा मज़ाक़ लगा
    जाने वालों ने फ़ुर्सत से देखा मुझ को

    इतना ज़्यादा गहरा था ये नशेब-ए-दिल
    उतरने वालों ने छत से देखा मुझ को

    अपनी प्यास बचा लाया हूँ इतनी दूर
    दरिया दरिया ने हैरत से देखा मुझ को

    उस घर में चारों ओर बेटियाँ थी बस
    सबने शिद्दत-ओ-हसरत से देखा मुझ को
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    " शॉर्टकट "
    हम क्यूँ दौड़ लगाऍं दोस्त
    ये सब अपना काम नहीं है
    ये भाग-दौड़ फ़क़त ज़िंदगी की है दोस्त
    जिस की मंज़िल मौत है पर
    सब को मगर उरूज-ए-तरक़्क़ी
    नशात-ए-दहर की तलाश या
    दौलत-ओ-शोहरत का
    रोज़ बहाना देती रहती है दोस्त
    अगर पहुँचना ही है मंज़िल-ए-मौत तलक तो
    वक़्त के ऊबड़-खाबड़ रस्ते पे
    हम क्यूँ दौड़ लगाऍं दोस्त
    हम क्यूँ न आज ऐसा करें कि अब
    इस ज़िंदगी के तलवों के नीचे हम
    अपने टूटे ख़्वाब बिछा दें
    आतिश-ए-अफ़सुर्दगी-ए-दिल से हम
    क्यूँ न मलाल की तेग़-ए-आहन निकाल के
    इस ज़िंदगी के सीने में घुसा दें
    इस सफ़र-ए-मौत के तवील रस्ते को
    हम शॉर्टकट बना दें
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    "याद का चेहरा"
    इक रोज़ की इक शाम को इक पार्क में मेरी तरफ़
    रख रख के माथे को ज़मीं पे धूप वो आती रही
    और साथ में उस के कोई तो याद का चेहरा भी था
    जो धूप सीने पे लगा के अपने वो चेहरे की याद
    या याद का चेहरे को मेरी सम्त को लाती रही
    वो याद का चेहरा ढका था रौशनी से सर-ब-सर
    सो इस लिए मेरी नज़र में दूर से ओझल रहा
    पर जब मेरे नज़दीक वो आता रहा तो ये हुआ
    मेरी नज़र में और भी ओझल हुआ फिर और हुआ
    जैसे कि मिट्टी ख़ाक में ख़ुश्बू हवा में या सफ़ेद
    अक्षर किसी काग़ज़ पे और फिर देखते ही देखते
    जब मुझ से वो गुज़रा तो फिर मालूम मुझ को ये हुआ
    वो धूप था जो जाके कल की सुब्ह में खो जाएगा
    और मैं वो साया हूँ जो जा के रात में खो जाएगा
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    मेरा सपना देखना सर फोड़ देगा
    अब तमाशा देखना सर फोड़ देगा

    एक मुद्दत से ख़सारे में रहा हूँ
    अब मुनाफ़ा देखना सर फोड़ देगा

    रंग भरने को दर-ओ-दीवार पर आज
    वो दिवाना देखना सर फोड़ देगा

    कर रहा है आरज़ू दरवेश बच्चा
    अब सितारा देखना सर फोड़ देगा

    आने दे ज़िंदान-ए-दिल में अपने वरना
    ये परिंदा देखना सर फोड़ देगा

    चाँद जब बादल उतारेगा बदन से
    वो दरीचा देखना सर फोड़ देगा

    देखने को रुख़ ज़मीं का उस तरफ़ से
    इक सितारा देखना सर फोड़ देगा

    आज अपने पेट के ख़ातिर किसी का
    एक बच्चा देखना सर फोड़ देगा
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    ख़ून-ए-ज़ख़्म-ए-ख़्वाब से पहले-पहल बू आएगी
    फिर पसीने में उदासी मेरे पहलू आएगी

    नाम पर उस के इधर जाने किधर से मेरे पास
    एक इतराकर के बलखाकर के ख़ुश्बू आएगी

    उस नदी का नाम सब उल्फ़त रखेंगे एक रोज़
    जब मिरी ये आग तेरे बर्फ़ को छू आएगी

    जो पहनता हो गुलों की ख़ाल को शाम-ओ-सहर
    ग़ैर-मुमकिन है कि उस को अपनी ख़ुश्बू आएगी

    ध्यान इतना दे दिया है तेरी आमद पर यहाँ
    अब गुज़र जाने के तेरे बा'द भी तू आएगी

    रख लिया है सर पे सूरज तो बड़ा मग़रूर हूँ
    देखना अब मेरी परछाई जो हर-सू आएगी
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    प्यार का जब सवाल रक्खा है
    तो कशिश कह के टाल रक्खा है

    आज शीशे में देख कर ख़ुद को
    इक परिंदा उछाल रक्खा है

    मैं तो वो टूटी बैंच हूँ जिस
    में
    इक गुलाबी रुमाल रक्खा है

    उस के इक इक ख़याल का मैं ने
    कितना अच्छा ख़याल रक्खा है

    एक बेशर्म अब्र ने देखो
    मुँह में सीना निकाल रक्खा है
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    बेहोश था पहाड़ में
    जब घर मिला पहाड़ में

    तू सर झुका पहाड़ में
    है देवता पहाड़ में

    दो दिन रहा मैं गाँव में
    पर खो गया पहाड़ में

    सोने समय ख़ुदा ने फिर
    इक सर रखा पहाड़ में

    बचपन छुपा था पीठ में
    जब दी सदा पहाड़ में

    आँखें मिलाई उस ने जब
    मंदिर दिखा पहाड़ में

    मानो तिरा बदन कोई
    हो रास्ता पहाड़ में

    वो मेरे दिल में इतना है
    जितनी हवा पहाड़ में

    उस का शबाब देख के
    ग़ुंचा खिला पहाड़ में

    सब इश्क़ इश्क़ कह रहे
    मैं कह रहा पहाड़ में
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    देखता जब तू फ़लक पर
    रंग खिलता है धनक पर

    रात दरवाज़ा खुला है
    ख़्वाब में तेरी झलक पर

    लग गया चश्मा मुझे भी
    हुस्न की तेरी चमक पर

    उड़ गई है नींद मेरी
    चूड़ियों की इक खनक पर

    मैं तिरे पीछे नहीं हूँ
    चल रहा हूँ बस महक पर

    हो गई है ख़त्म चीनी
    लब लगा दे तू नमक पर
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    प्यार का बस इक इशारा ही मिले
    डूब जाऊँगा अगर मछली मिले

    उम्र क़ैदी इश्क़ का हूँ पर मुझे
    उस की बाँहों से अभी फाँसी मिले

    भाग जाता दूर कब का इश्क़ से
    गर कफ़स में एक भी खिड़की मिले

    शाम आँखें हो थकी और वो दिखे
    मुफ़्लिसी हो रोटियों पर घी मिले

    खोल दूँ सारा बदन उस का अगर
    इस तिजोरी की मुझे चाबी मिले

    हाथ रख दिल पर भले छू मत कहीं
    काम पर रख सैलरी कुछ भी मिले
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    आज तुम ने किस को ये बोसा किया है
    कुछ किया है तो कहाँ ख़र्चा किया है

    देखता तू क्यूँ नहीं इक सम्त मेरी
    क्या तुझे भी प्यार ने अंधा किया है

    दिल को भी उम्मीद थी उस से कि जिस ने
    काम भी दफ़्तर में इक हफ़्ता किया है

    ढूँढ़ता जब भी में ख़ुद को दिल गली में
    बे-वफ़ा ने पीठ में धप्पा किया है

    देख कर सूरत बुरी देखी न सीरत
    शीशे ने भी हर्फ़ को उल्टा किया है

    छोड़ देंगे ख़्वाब तेरा कल से अब हम
    रात ठहरो रात से वा'दा किया है
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