"याद का चेहरा"

इक रोज़ की इक शाम को इक पार्क में मेरी तरफ़
रख रख के माथे को ज़मीं पे धूप वो आती रही
और साथ में उस के कोई तो याद का चेहरा भी था
जो धूप सीने पे लगा के अपने वो चेहरे की याद
या याद का चेहरे को मेरी सम्त को लाती रही
वो याद का चेहरा ढका था रौशनी से सर-ब-सर
सो इस लिए मेरी नज़र में दूर से ओझल रहा
पर जब मेरे नज़दीक वो आता रहा तो ये हुआ
मेरी नज़र में और भी ओझल हुआ फिर और हुआ
जैसे कि मिट्टी ख़ाक में ख़ुश्बू हवा में या सफ़ेद
अक्षर किसी काग़ज़ पे और फिर देखते ही देखते
जब मुझ से वो गुज़रा तो फिर मालूम मुझ को ये हुआ
वो धूप था जो जाके कल की सुब्ह में खो जाएगा
और मैं वो साया हूँ जो जा के रात में खो जाएगा

— khamakhaah

More by khamakhaah

Other nazm from the same pen

See all from khamakhaah →

Nazar Shayari

Shers of nazar.

All Nazar Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling