देखता जब तू फ़लक पर
रंग खिलता है धनक पर
रात दरवाज़ा खुला है
ख़्वाब में तेरी झलक पर
लग गया चश्मा मुझे भी
हुस्न की तेरी चमक पर
उड़ गई है नींद मेरी
चूड़ियों की इक खनक पर
मैं तिरे पीछे नहीं हूँ
चल रहा हूँ बस महक पर
हो गई है ख़त्म चीनी
लब लगा दे तू नमक पर
— khamakhaah















