हम ऐसे लोगों को तिश्ना-लबी पसंद आई
उन्हें बता दे कोई वाक़ई पसंद आई
ज़माने वालों से मिलता नहीं मिज़ाज अपना
तमाम रंगों में इक साँवली पसंद आई
हम ऐसे लोग क़दम-बोसी भी नहीं करते
ये और बात हमें आशिक़ी पसंद आई
ख़ुद अपनी ज़िन्दगी को दाँव पर लगा दिया है
मैं क्या करूँँ मुझे उस की ख़ुशी पसंद आई
कहीं कहीं पे मुहब्बत के मानी मुझपे खुले
कहीं कहीं पे मुझे शा'इरी पसंद आई
मैं इस पे फ़ख़्र करूँँ या कि बद्दुआएँ दूँ
पसंद दुनिया को 'ताबिश' की ही पसंद आई
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