न जाने मैं दुनिया से क्या चाहता हूँ

मैं पागल हूँ सबका भला चाहता हूँ

बला की हो तुम ख़ूब-सूरत मेरी जाँ
मगर मैं भी ऐसी बला चाहता हूँ

ज़रूरत है मुझ को ज़रा रौशनी की
मैं सूरज नहीं बस दिया चाहता हूँ

ख़ुदा से भी माँगी ख़ुशी मैं ने उस की
वो कहती है उस का बुरा चाहता हूँ

मुझे यार तो चाहिए बस पुराने
मगर बाक़ी सब कुछ नया चाहता हूँ

चलो मुझ को ले कर मेरे गाँव जल्दी
खुले आसमाँ की हवा चाहता हूँ

तुम्हें देख कर भी नज़र फेर पाऊँ
जिगर में मैं इतनी अना चाहता हूँ

— Sachin kumar

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