थक गया ढूॅंढ के पर मिला ही नहीं
मेरे ज़ख़्मों की कोई दवा ही नहीं
नर्म हाथों में चारा-गरी है मगर
उस ने मुझ को अभी तक छुआ ही नहीं
हुस्न तुम सेा ख़ुदा से बना इक दफ़ा
हुस्न ऐसा कभी फिर बना ही नहीं
दर्द में काम आती है मन्नत सचिन
पर तेरे हिस्से में वो दुआ ही नहीं
— Sachin kumar















