किया क्या कुछ नहीं मैं ने मोहब्बत की सी आदत में
इज़ाफ़ा हो गया अब तो मेरी रूखी तबीयत में
बहुत ही मुख़्तलिफ़ थे ये बड़ा सा फ़र्क़ था शायद
नज़र आया नहीं मुझ को जो ख़्वाबों में हक़ीक़त में
नहीं जो तू नहीं फिर मैं नहीं ये आसमाँ तारे
कहा क्या कुछ नहीं मैं ने ज़रा सी इस मोहब्बत में
यक़ीं आता नहीं मुझ को या फिर करता नहीं हूँ मैं
कि पागल था कहा वो सब नहीं था जो हक़ीक़त में
जो कहना था न कह पाया जो सुनना था न सुन पाया
फ़क़त पाया हुनर ऐसा जो भी कहना सहूलत में
— Umashankar Lekhwar















