सोज़-ए-दिल में मुब्तला हर शख़्स दिखता है मुझे
ख़्वाब से टूटा हुआ हर शख़्स दिखता है मुझे
प्यार की नगरी में साद अफ़सोस की इक बात है
प्यार का मारा हुआ हर शख़्स दिखता है मुझे
कौन किस पर किस तरह करता रहे यूँ ऐतिबार
क्योंकि चेहरों में छुपा हर शख़्स दिखता है मुझे
अब हवा-ए-ज़ुल्म से हम सब न हो जाएँ निसार
राह-ए-हक़ से गुमशुदा हर शख़्स दिखता है मुझे
मैं असीर-ए-ज़ुल्मत-ए-शब हो गया हूँ अब वसीम
रौशनी से भागता हर शख़्स दिखता है मुझे
— Waseem Siddharthnagari















