चूम कर माथा और दुआ देता
इस से बढ़कर मैं और क्या देता
इत्तिफ़ाक़न अगर वो याद आती
ख़ुश रहे बस यही दुआ देता
मैं जो ग़म पर ग़िलाफ़ रखता नहीं
ग़म मुझे कौन फिर नया देता
इस लिए अब फ़सुर्दा रहता हूँ
बाप होता तो हौसला देता
मैं अगर ख़ुद न भूलता रस्ता
भूले-भटके को रास्ता देता
अपने अंदर भी झाँक कर देखे
इस लिए उस को आइना देता
जिस को मैं ख़ूब याद करता हूँ
कम से कम वो मुझे भुला देता
— Waseem Siddharthnagari















