सोच रक्खा था मैं ने भी क्या क्या नहीं
सोचने भर से पर कुछ भी होता नहीं
गर जो चाहूँ तो कर लूँ दुबारा ये इश्क़
पर मैं अब जोश में होश खोता नहीं
ख़ामुशी बे-कली बे-हिसी तेरी याद
और ऊपर से मौसम भी अच्छा नहीं
अब भी ख़ुशबू है याँ उस के अन्फ़ास की
हाँ वो शायद बिछड़ कर भी बिछड़ा नहीं
लर्ज़िश-ए-दस्त-ओ-पा चश्म-ए-नम भारी मन
इश्क़ की इंतिहा में कुछ अच्छा नहीं
था गवारा तुझे मुझ को खोना तो जा
तुझ को पाना मुझे अब गवारा नहीं
अब तो रग़बत नहीं शाइरी से भी 'ज़ान'
अब मिरे ग़म का कोई मुदावा नहीं
— Zaan Farzaan














