
तुझे न मेरी कोई ख़बर थी मुझे न कोई तिरा पता था
मैं शहर में ढूँढ़ता था जिस को वो गाँव में कब से लापता था
जिधर से तू रोज़ जाया करती जो बाग़ से राब्ता था तेरा
न ही कहीं पे थी तेरी ख़ुश्बू न ही कहीं पे अता-पता था
— ZafarAli Memon
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