wafa ki samt aziyat ke siva kuchh bhi nahin | वफ़ा की सम्त अज़ीयत के सिवा कुछ भी नहीं

  - Prince

वफ़ा की सम्त अज़ीयत के सिवा कुछ भी नहीं
जो भी उस ओर गया उसका रहा कुछ भी नहीं

जिसे हम देखके हो जाते थे बेसुध से कभी
उसकी आँखों के मुक़ाबिल ये नशा कुछ भी नहीं

कैसे कह दूँ के मेरा उस से तअल्लुक़ ही नहीं
मैंने उसके सिवा तो यारों लिखा कुछ भी नहीं

वो भी बेचैन रहा जिसने मुहब्बत नहीं की
'इश्क़ जिसने भी किया उसका बचा कुछ भी नहीं

एक रहज़न मेरे दिल को यूँँ गया लूट के दोस्त
कि सिवा ग़म के मेरे दिल में बचा कुछ भी नहीं

हम ग़म-ए-हस्ती से उकताए भी जाएँगे कहाँ
चारा-ए-ज़िन्दगी मरने के सिवा कुछ भी नहीं

वो गया तो मेरा दिल भी नहीं लौटाके गया
यारों इसके सिवा तो उस सेे गिला कुछ भी नहीं

मैं भला क्यूँ न करुँ ज़िन्दगी से शिकवा कोई
ज़िन्दगी ने सिवा गम मुझको दिया कुछ भी नहीं

यारों फिलहाल तो मैं ऐसे सफ़र में हूँ जहाँ
मेरी मंज़िल कहाँ है मुझको पता कुछ भी नहीं

सोचता हूँ के दिल-ए-ख़स्ता को दफ़ना दूँ कहीं
इस ग़म-ए-दिल की वगरना तो दवा कुछ भी नहीं

आज वो ही हमें मरने की दुआ देता है
जो कभी कहता था हम सेे के दुआ कुछ भी नहीं

ख़त जलाने से कहाँ जलती हैं यादें आख़िर
ख़ाक-बेज़ी के सिवा हमको मिला कुछ भी नहीं

तुमने जिसको था बनाया कभी अपने हाथों
सो वही आदमी कहता है ख़ुदा कुछ भी नहीं

अब उसे क्या कहूँ आख़िर के मुहब्बत क्या है
प्रिंस जिसको ये भरम है कि वफ़ा कुछ भी नहीं

  - Prince

Udasi Shayari

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