Prince
Prince
Ghazal

वफ़ा की सम्त अज़ीयत के सिवा कुछ भी नहीं

जो भी उस ओर गया उस का रहा कुछ भी नहीं

जिसे हम देखके हो जाते थे बेसुध से कभी
उस की आँखों के मुक़ाबिल ये नशा कुछ भी नहीं

कैसे कह दूँ के मेरा उस से तअल्लुक़ ही नहीं
मैं ने उस के सिवा तो यारों लिखा कुछ भी नहीं

वो भी बेचैन रहा जिस ने मुहब्बत नहीं की
इश्क़ जिस ने भी किया उस का बचा कुछ भी नहीं

एक रहज़न मेरे दिल को यूँ गया लूट के दोस्त
कि सिवा ग़म के मेरे दिल में बचा कुछ भी नहीं

हम ग़म-ए-हस्ती से उकताए भी जाएँगे कहाँ
चारा-ए-ज़िन्दगी मरने के सिवा कुछ भी नहीं

वो गया तो मेरा दिल भी नहीं लौटाके गया
यारों इस के सिवा तो उस से गिला कुछ भी नहीं

मैं भला क्यूँ न करुँ ज़िन्दगी से शिकवा कोई
ज़िन्दगी ने सिवा ग़म मुझ को दिया कुछ भी नहीं

यारों फ़िलहाल तो मैं ऐसे सफ़र में हूँ जहाँ
मेरी मंज़िल कहाँ है मुझ को पता कुछ भी नहीं

सोचता हूँ के दिल-ए-ख़स्ता को दफ़ना दूँ कहीं
इस ग़म-ए-दिल की वगरना तो दवा कुछ भी नहीं

आज वो ही हमें मरने की दुआ देता है
जो कभी कहता था हम से के दुआ कुछ भी नहीं

ख़त जलाने से कहाँ जलती हैं यादें आख़िर
ख़ाक-बेज़ी के सिवा हम को मिला कुछ भी नहीं

तुम ने जिस को था बनाया कभी अपने हाथों
सो वही आदमी कहता है ख़ुदा कुछ भी नहीं

अब उसे क्या कहूँ आख़िर के मुहब्बत क्या है
प्रिंस जिस को ये भरम है कि वफ़ा कुछ भी नहीं

— Prince

More by Prince

Other ghazal from the same pen

See all from Prince →

Ishq Shayari Collection

Shers of ishq shayari collection.

All Ishq Shayari Collection poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling