तुम बची हो न ही बचे हम हैं
ज़िंदगी है और उस
में कुछ ग़म हैं
वक़्त बदला है और ये मौसम
तुम भी तो हो वही वही हम हैं
अपने घर के नवाब होगे तुम
इस जहाँ के नवाब तो हम हैं
दुश्मनी इश्क़ देख कर करते
अरे तुम तुम हो और हम हम हैं
आजकल लोग हँस रहे हैं बहुत
इस हँसी में छुपे हुए ग़म हैं
— Prashant Kumar















