"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है"

तू सब से जुदा है तू सब से हसीं है
मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है
मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

तुझे देख कर ही निकलता है सूरज
तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज
तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ
ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ
तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है
मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं
बिना बात के फूल भी फेंकते हैं
कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है
यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है
बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है
मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है

— Prashant Kumar

More by Prashant Kumar

Other nazm from the same pen

See all from Prashant Kumar →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling