ये सोच कर के दिल कभी होता नहीं उदास
कुछ ख़ास लोग हैं अभी अपने भी आस पास
यादें तेरी शराब से रुकती नहीं मगर
आँखों के सामने से भी हटता नहीं गिलास
हम पर मशक़्क़तों से कमाकर रक़म किए
हाए वो मेरे बाप के इकतीस सौ पचास
कर ली हया ने ख़ुद-कुशी दिखने लगा बदन
उपहास बन के रह गए अच्छे भले लिबास
मिल कर वो ऐसे खो गया दुनिया की भीड़ में
जैसे कि इल्म था ही नहीं अपने आस पास
— Adesh Rathore















