Adesh Rathore

Adesh Rathore

@adeshrathore01

Adesh Rathore shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Adesh Rathore's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

हम से अच्छा लिखने वालों को जब मंच नहीं हासिल हम कुछ अच्छा लिख लेंगे तो क्या अच्छा हो जाएगा — Adesh Rathore
कहते हैं लड़कियों को सर-ए-राह छेड़कर ये सब न हो ख़ुदाया मेरी बेटियों के साथ — Adesh Rathore
हम बे-सबब उदास नहीं रहते बरमला बाँटी गईं उदासियाँ हम शाइरों के बीच — Adesh Rathore
ज़रूरी है हमें मिलती रहे छाया बुज़ुर्गों की नलों के पास ये फुलवार याँ बेहद ज़रूरी है — Adesh Rathore
करो किसी से बहाना-बाज़ी कि सच बताओ मेरी बला से हमारे दिल से उतर चुके हो कहीं भी जाओ मेरी बला से — Adesh Rathore
वो जो आवारा थे वही लड़के घर भी अब बे-सबब नहीं जाते — Adesh Rathore
बिछड़ बैठे हैं सूरत पर बिछड़ने का असर भी है उदासी है मुसलसल है इधर भी है उधर भी है — Adesh Rathore
हमें भी गर सहूलत ख़ुद-कुशी की दे अगर मौला तो हम भी ज़िन्दगी के जाल से आज़ाद हो जाऍं — Adesh Rathore
मेरे हमदम दिसंबर की नमी रातों में भी अक्सर तुम्हारी याद आती है पसीने छूट जाते हैं — Adesh Rathore

Ghazal

है आलम बेशऊरी का क़रीने छूट जाते हैं मैं जब हासिल करूँँ तारे दफ़ीने छूट जाते हैं मैं पछताता हूँ अपने फ़ैसलों पर जब कभी मुझ सेे तेरे जैसों की चाहत में नगीने छूट जाते हैं समुंदर जैसी आँखें हैं तिलिस्माती लब-ओ-लहजा वो इक टक देखता है और सफ़ीने छूट जाते हैं मेरे हमदम दिसंबर की नमी रातों में भी अक्सर तुम्हारी याद आती है पसीने छूट जाते हैं तुम्हारे साथ में बीते हुए लम्हों के साए में अगर बैठा रहूॅं पल भर महीने छूट जाते हैं चलूॅं जो साथ यारों के तो पीछे छूट जाता हूँ अगर आगे निकल जाऊँ कमीने छूट जाते हैं — Adesh Rathore
मैं तुझ सेे मिलने अगर तेरे घर कभी जो आऊॅं तो क्या करेगा भुला के सारी बला की बातें मिलाएगा रुख़ वफ़ा करेगा तेरी सगाई के सारे ग़म तो मैं जैसे तैसे निगल गया हूँ मगर मैं तब क्या करूँॅंगा जब तू गले लगाकर जुदा करेगा है क्या अज़िय्यत है कैसा मंज़र ये कैसी मुश्किल घड़ी है आई तुम्हारी बाहों में रहने वाला तुम्हारे बिन अब रहा करेगा हमारे हक़ में तो तुम थे गोया जो बदनसीबी से छिन चुके हो ये दिल तुम्हारा मुरीद है सो तुम्हारे हक़ में दुआ करेगा मेरे कलेजे में रहने वाले तुझे ये शादी बहुत मुबारक ख़ुशी है मुझ को मगर ये दुख भी कोई तुझे अब छुआ करेगा मैं अपने कूचे में मुतमइन हूँ तू अपनी गलियों में ख़ुश रहा कर हमारी क़िस्मत में क्या लिखा है ये फ़ैसला तो ख़ुदा करेगा बहुत मुहब्बत भी कर ली हम ने बहुत ख़सारा भी कर लिया है चलो पुरानी हुई मुहब्बत 'अदेश' अब कुछ नया करेगा — Adesh Rathore
तुम ने हमें भी साथ निभाने नहीं दिया दिल में किसी भी ग़ैर को आने नहीं दिया हम पर है ज़िंदगी ने किया ज़ुल्म इस क़दर रोने दिया तो शोर मचाने नहीं दिया इक बार हम ने दर्द को दिल में पनाह दी और ज़िंदगी से फिर कभी जाने नहीं दिया दुश्वारियों के ख़ौफ़ से जीने का मन न था मजबूरियों ने ज़हर भी खाने नहीं दिया दौलत पे अपनी कल बड़ा इतरा रहे थे जो कुछ भी ख़ुदा ने साथ में लाने नहीं दिया ख़ुद अपनी ख़्वाहिशात की पर्वा किए बग़ैर काँटों को तेरी राह में आने नहीं दिया आँखें न भूल जाऍं कहीं अपनी हैसियत सो इनको तेरा ख़्वाब सजाने नहीं दिया दुनिया में इल्म लोग हैं दो क़िस्म के मगर ख़ुद को किसी भी क़िस्म में आने नहीं दिया — Adesh Rathore

Nazm

"अजनबी लड़का" तुम्हारी उम्र के बारे में क्या जानूँ मैं कोई अजनबी लड़का जो इक दुनिया में रहता है जो उस ने ख़ुद बनाई है न जिस में शाम होती है न जिस में रात होती है फ़क़त तन्हाई होती है फ़क़त बरसात होती है उसी बरसात में भीगा हुआ सहमा हुआ लड़का न तुझ को याद करता है न तुझ को भूल पाता है बड़ी संजीदगी से ग़म छुपा लेता है अपना और ये ऑंसू बारिशों की आड़ में ख़ुद बह निकलते हैं न कोई देख पाता है न कोई जान पाता है ये बारिश है कि आँसू हैं मगर ये भी हक़ीक़त है कि तुम हो इक गुलाबी फूल की कोमल कली जैसी मैं भँवरा वही भँवरा जो है रंगों का दीवाना सो पहली मर्तबा देखा तो तुम सेे प्यार कर बैठा दिल-ए-नादाँ मगर उस को कहाँ ये इल्म था तुम और ही कुछ हो हो कोई हूर जन्नत की हो कोई अप्सरा शायद मगर हम सब तो बस अंबर को अपनी छत समझते हैं हमारे पास है ही क्या हमीं वो लोग हैं जिन का न कोई घर न कोई जात कोई धर्म होता है सो बस जीते हैं तो ये सोच कर मरने में बाक़ी हैं अभी दो चार दिन तब तक तुम्हीं से इश्क़ करते हैं मैं वाक़िफ़ हूँ कि तुम भी ख़ूब-सूरत हो मगर मैं भी बहुत ज़िद्दी सो बस तुम सेे मुहब्बत की तुम्हें देखा फ़क़त देखा तुम्हारी उम्र क्या है क्यूँ कहाॅं रहती हो इस सेे मुझ को मतलब क्या मुझे तो बस मुहब्बत है मैं कोई वैद्य थोड़ी हूँ जो तुम को देख कर तुम को बता दूँगा तुम्हारी उम्र कितनी है तुम्हारी उम्र के बारे में क्या जानूँ मैं कोई अजनबी लड़का — Adesh Rathore
“भुला दूँ मैं “ भुला दूँ मैं वो दिन कैसे झिझकते और दबे स्वर में गया कमरे के भीतर मैं पिता जी चारपाई पर खड़ा था मैं चटाई पर कहा क्या बात है बेटा अभी तो रात है बेटा मैं बोला फ़ीस भरनी थी उसी की बात करनी थी हिचक कर फ़ीस भर तो दी तो फिर अब फ़ीस काहे की ज़रा सा काम था पापा परीक्षा फ़ॉर्म था पापा सो कुछ पैसे ज़रूरत हैं फ़क़त कल के महूरत हैं पिताजी ने मुहब्बत से कहा कल तक रुको बेटे हुई जब भोर क़िस्मत की कथा सब माॅं तलक पहुॅंची तो घर के रिक्त कोनों में हुई चर्चा ये दोनों में हैं चुप दोनों इसी डर में कि पैसे हैं कहाॅं घर में सभी गहने पड़े गिरवी ॲंगूठी है सगाई की निशानी है यही अंतिम न इस को डालने दूॅंगी पिता ने इक नहीं मानी चला कर अपनी मनमानी जिगर पर रख लिया पत्थर तबस्सुम को रगड़ मुख पर ॲंगूठी डाल दी गिरवी दिए ला कर मुझे पैसे भुला दूँ मैं वो दिन कैसे — Adesh Rathore