मय से वो जाम-ए-जिस्म है जब से भरा हुआ
सर है फ़ुतूर-ए-ख़्वाहिश-ए-शब से भरा हुआ
दिल है कि जानता है जुनूँ का मआल भी
सर है कि फिर भी शोर-ओ-शग़ब से भरा हुआ
ग़फ़लत-शिआ'र दिल पे कोई रात डाल कर
जाता है मेहर ग़ैज़-ओ-ग़ज़ब से भरा हुआ
दीवार-ए-मै-कदा कोई रस्ते में आ गई
वर्ना ये जाम है कोई अब से भरा हुआ
हटता नहीं निगाह-ए-अलमनाक से कभी
चेहरा कोई ख़ुमार-ए-तरब से भरा हुआ
— Afzaal Naveed















