रह-ए-सुलूक में बल डालने पे रहता है

लहू का खेल ख़लल डालने पे रहता है

ये देखता नहीं बुनियाद में हैं हड्डियाँ क्या
हर एक अपना महल डालने पे रहता है

मुहिम पे रोज़ निकलता है ताजिर-ए-बारूद
और एक ख़ौफ़-ए-अजल डालने पे रहता है

और एक हाथ मिलाता है ज़हर पानी में
और एक हाथ कँवल डालने पे रहता है

और एक हाथ खिलाता है शाख़ पर कोंपल
और एक हाथ मसल डालने पे रहता है

और एक हाथ उठाता है परचम-ए-आवाज़
और एक हाथ कुचल डालने पे रहता है

और एक हाथ बढ़ाता है इर्तिक़ा का सरूप
और एक हाथ बदल डालने पे रहता है

सब एक रद्द-ए-अमल का अमल है और नहीं
जो एक रद्द-ए-अमल डालने पे रहता है

रुजूअ' ला-मुतज़लज़ल है जो मसाइल का
दिमाग़ में कोई हल डालने पे रहता है

हम अपना रद्द-ओ-बदल डाल देते हैं उस में
वो अपना रद्द-ओ-बदल डालने पे रहता है

मियान-ए-साबित-ओ-सय्यार इर्तिकाज़ मिरा
अबद के बीच अज़ल डालने पे रहता है

ये सुब्ह-ओ-शाम पे फैला हुआ मिरा होना
ये मेरे आज में कल डालने पे रहता है

हर एक राह-गुज़र से गुज़रता है सूरज
और इक शुआ-ए-अटल डालने पे रहता है

पसंद आते नहीं सीधे-साधे लोग उसे
वो अपने माथे पे बिल डालने पे रहता है

रविश कोई भी ज़ियादा उसे नहीं भाती
वो अपना आप बदल डालने पे रहता है

'नवेद' ताइर-ए-लाहूती का जुनूँ तो नहीं
जो डाल डाल पे फल डालने पे रहता है

— Afzaal Naveed

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